चतरई (Chatrai) is not only cleverness. this single word have much more meanings in my dehati language. like that- learninng, foolness, talent, intelligence, brilliance, ability, genius, intellect, capability, competence, education, proficiency, erudition, sagacity, wisdom, inbrain, smartness, shrewdness, acuity, ingenuity, resourcefulness, cunning,..........
Monday, March 27, 2023
औषधियों में विराजती है नवदुर्गा
औषधियों में विराजती है नवदुर्गा
Thursday, January 26, 2023
काल भैरव अष्टक
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम्
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥1॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम्।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥2॥
शूलटङ्कपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम्।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥3॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम्।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥4॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशकं कर्मपाशमोचकं सुशर्मदायकं विभुम्।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभिताङ्गमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥5॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम्।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥6॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपातनष्टपापजालमुग्रशासनम्।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥7॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम्।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥8॥
कालभैरवाष्टकं पठन्ति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं ते प्रयान्ति कालभैरवाङ्घ्रिसन्निधिं ध्रुवम् ॥
इति श्रीमच्छङ्कराचार्यविरचितं कालभैरवाष्टकं संपूर्णम्
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमस्कार, जिनके चरण कमलों में देवों के राजा, भगवान इंद्र द्वारा पूजनीय हैं; जिसके गले में सर्प, मस्तक पर चन्द्रमा और उनका यह रूप करुणामयी है; जिनकी स्तुति नारद, देवताओं ऋषियों और अन्य योगियों द्वारा की जाती है; जो एक दिगंबर है, जो आकाश को अपनी पोशाक के रूप में पहने हुए है, जो उनके स्वतंत्र होने का प्रतीक है। ( 1 )
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को, जिनके पास एक लाख सूर्यों का तेज है, जो भक्तों को पुनर्जन्म के चक्र से बचाता है, और जो सर्वोच्च है; जिसका कंठ नीला है, जो हमें हमारी इच्छा पूरी करता है, और जिसके तीन नेत्र हैं; जो स्वयं मृत्युपर्यंत है और जिसकी आंखें कमल के समान हैं; जिसका त्रिशूल संसार को धारण करता है और जो अमर है। (2)
हाथों में त्रिशूल, मटका, फंदा और क्लब धारण करने वाले काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमस्कार; जिसका शरीर अन्धकारमय है, जो आदिम प्रभु है, जो अमर है, और संसार के रोगों से मुक्त है; जो बेहद पराक्रमी है और जिसे अद्भुत तांडव नृत्य पसंद है। (3)
भगवान कालभैरव को नमस्कार, काशी के सर्वोच्च स्वामी, जो इच्छाओं और मोक्ष दोनों को प्रदान करते हैं, जिनके पास एक सुखद रूप है; जो अपने भक्तों को प्रिय है, जो सभी लोकों के देवता के रूप में स्थिर है; जो अपनी कमर के चारों ओर एक सोने का कमरवंध पहनता है जिसमें घंटियाँ होती हैं जो उसके चलने पर मधुर ध्वनि उत्पन्न करती हैं। ( 4 )
भगवान कालभैरव को नमस्कार, काशी के सर्वोच्च स्वामी, जो यह सुनिश्चित करते हैं कि धर्म (धार्मिकता) प्रबल है, जो अधर्म (अधर्म) के मार्ग को नष्ट कर देता है; जो हमें कर्म के बंधन से बचाता है, जिससे हमारी आत्मा मुक्त होती है; और जिसके शरीर में सुनहरे रंग के सर्प बंधे हुए हैं। ( 5 )
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमस्कार, जिनके चरण रत्नों के साथ दो स्वर्ण जूतों से सुशोभित हैं; जो शाश्वत, अद्वैत इष्ट देवता (हमारी इच्छाओं को पूरा करने वाले भगवान) हैं; जो यम (मृत्यु के देवता) के अभिमान को नष्ट कर देता है; जिनके भयानक दांत हमें आजाद करते हैं। ( 6 )
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमस्कार, जिनकी तेज गर्जना कमल में जन्मे ब्रह्मा की रचनाओं (अर्थात् हमारे मन के भ्रम) को नष्ट कर देती है; जिसकी एक झलक ही हमारे सारे पापों का नाश करने के लिए काफी है। जो हमें आठ सिद्धियाँ (उपलब्धियाँ) देता है; और जो खोपड़ियों की माला पहनता है। ( 7 )
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमस्कार, जो भूतों और भूतों के नेता हैं, जो महिमा प्रदान करते हैं; जो काशी के लोगों को उनके पापों और धर्मों से मुक्त करता है; जो हमें धर्म के मार्ग पर ले चलता है, जो ब्रह्मांड का सबसे प्राचीन (शाश्वत) स्वामी है। ( 8 )
काशी के सर्वोच्च स्वामी भगवान कालभैरव को नमन। जो लोग कालभैरव अष्टकम के इन आठ श्लोकों को पढ़ते हैं, जो सुंदर है, जो ज्ञान और मुक्ति का स्रोत है, जो व्यक्ति में धार्मिकता के विभिन्न रूपों को बढ़ाता है, जो दु: ख, मोह, दरिद्रता, लोभ, क्रोध और गर्मी का नाश करता है – (मृत्यु के बाद) भगवान कालभैरव (भगवान शिव) के चरणों को प्राप्त करेंगे। ( 9 )🙏🙏🙏
Saturday, January 14, 2023
आदित्यहृदय स्तोत्र
विनियोग
ॐ अस्य आदित्य हृदयस्तोत्रस्यागस्त्यऋषिरनुष्टुपछन्दः, आदित्येहृदयभूतो
भगवान ब्रह्मा देवता निरस्ताशेषविघ्नतया ब्रह्मविद्यासिद्धौ सर्वत्र जयसिद्धौ च विनियोगः।
ऋष्यादिन्यास
ॐ अगस्त्यऋषये नमः, शिरसि। अनुष्टुपछन्दसे नमः, मुखे। आदित्यहृदयभूतब्रह्मदेवतायै नमः हृदि।
ॐ बीजाय नमः, गुह्यो। रश्मिमते शक्तये नमः, पादयो। ॐ तत्सवितुरित्यादिगायत्रीकीलकाय नमः नाभौ।
करन्यास
ॐ रश्मिमते अंगुष्ठाभ्यां नमः। ॐ समुद्यते तर्जनीभ्यां नमः।
ॐ देवासुरनमस्कृताय मध्यमाभ्यां नमः। ॐ विवरवते अनामिकाभ्यां नमः।
ॐ भास्कराय कनिष्ठिकाभ्यां नमः। ॐ भुवनेश्वराय करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः।
हृदयादि अंगन्यास
ॐ रश्मिमते हृदयाय नमः। ॐ समुद्यते शिरसे स्वाहा। ॐ देवासुरनमस्कृताय शिखायै वषट्।
ॐ विवस्वते कवचाय हुम्। ॐ भास्कराय नेत्रत्रयाय वौषट्। ॐ भुवनेश्वराय अस्त्राय फट्।
इस प्रकार न्यास करके निम्नांकित मंत्र से भगवान सूर्य का ध्यान एवं नमस्कार करना चाहिए-
ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात।
आदित्यहृदय स्तोत्र
💐ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।
रावणं चाग्रतो दृष्टवा युद्धाय समुपस्थितम्।।1।।
दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।
उपगम्याब्रवीद् राममगरत्यो भगवांस्तदा।।2।।
उधर श्री रामचन्द्रजी युद्ध से थककर चिन्ता करते हुए रणभूमि में खड़े थे। इतने में रावण भी युद्ध के लिए उनके सामने उपस्थित हो गया। यह देख भगवान अगस्त्य मुनि, जो देवताओं के साथ युद्ध देखने के लिए आये थे, श्रीराम के पास जाकर बोले।
राम राम महाबाहो श्रृणु गुह्यं सनातनम्।
येन सर्वानरीन् वत्स समरे विजयिष्यसे।।3।।
'सबके हृदय में रमण करने वाले महाबाहो राम ! यह सनातन गोपनीय स्तोत्र सुनो। वत्स ! इसके जप से तुम युद्ध में अपने समस्त शत्रुओं पर विजय पा जाओगे।'
आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।
जयावहं जपं नित्यमक्षयं परमं शिवम्।।4।।
सर्वमंगलमांगल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।
चिन्ताशोकप्रशमनमायुर्वधैनमुत्तमम्।।5।।
'इस गोपनीय स्तोत्र का नाम है 'आदित्यहृदय'। यह परम पवित्र और सम्पूर्ण शत्रुओं का नाश करने वाला है। इसके जप से सदा विजय की प्राप्ति होती है। यह नित्य अक्ष्य और परम कल्याणमय स्तोत्र है। सम्पूर्ण मंगलों का भी मंगल है। इससे सब पापों का नाश हो जाता है। यह चिन्ता और शोक को मिटाने तथा आयु को बढ़ाने वाला उत्तम साधन है।'
रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।
पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्।।6।।
'भगवान सूर्य अपनी अनन्त किरणों से सुशोभित (रश्मिमान्) हैं। ये नित्य उदय होने वाले (समुद्यन्), देवता और असुरों से नमस्कृत, विवस्वान् नाम से प्रसिद्ध, प्रभा का विस्तार करने वाले (भास्कर) और संसार के स्वामी (भुवनेश्वर) हैं। तुम इनका (रश्मिमते नमः, समुद्यते नमः, देवासुरनमस्कताय नमः, विवस्वते नमः, भास्कराय नमः, भुवनेश्वराय नमः इन नाम मंत्रों के द्वारा) पूजन करो।'
सर्वदेवतामको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।
एष देवासुरगणाँल्लोकान् पाति गभस्तिभिः।।7।।
'सम्पूर्ण देवता इन्हीं के स्वरूप हैं। ये तेज की राशि तथा अपनी किरणों से जगत को सत्ता एवं स्फूर्ति प्रदान करने वाले हैं। ये ही अपनी रश्मियों का प्रसार करके देवता और असुरों सहित सम्पूर्ण लोकों का पालन करते हैं।'
एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।
महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः।।8।।
पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।
वायुर्वन्हिः प्रजाः प्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः।।9।।
'ये ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा, वरूण, पितर, वसु, साध्य, अश्विनीकुमार, मरुदगण, मनु, वायु, अग्नि, प्रजा, प्राण, ऋतुओं को प्रकट करने वाले तथा प्रभा के पुंज हैं।'
आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गर्भास्तिमान्।
सुवर्णसदृशो भानुहिरण्यरेता दिवाकरः।।10।।
हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।
तिमिरोन्मथनः शम्भूस्त्ष्टा मार्तण्डकोंऽशुमान्।।11।।
हिरण्यगर्भः शिशिरस्तपनोऽहरकरो रविः।
अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शंखः शिशिरनाशनः।।12।।
व्योमनाथस्तमोभेदी ऋम्यजुःसामपारगः।
घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवंगमः।।13।।
आतपी मण्डली मृत्युः पिंगलः सर्वतापनः।
कविर्विश्वो महातेजा रक्तः सर्वभवोदभवः।।14।।
नक्षत्रग्रहताराणामधिपो विश्वभावनः।
तेजसामपि तेजस्वी द्वादशातमन् नमोऽस्तु ते।।15।।
'इन्हीं के नाम आदित्य (अदितिपुत्र), सविता (जगत को उत्पन्न करने वाले), सूर्य (सर्वव्यापक), खग (आकाश में विचरने वाले), पूषा (पोषण करने वाले), गभस्तिमान् (प्रकाशमान), सुर्वणसदृश, भानु (प्रकाशक), हिरण्यरेता (ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति के बीज), दिवाकर (रात्रि का अन्धकार दूर करके दिन का प्रकाश फैलाने वाले), हरिदश्व (दिशाओं में व्यापक अथवा हरे रंग के घोड़े वाले), सहस्रार्चि (हजारों किरणों से सुशोभित), तिमिरोन्मथन (अन्धकार का नाश करने वाले), शम्भू (कल्याण के उदगमस्थान), त्वष्टा (भक्तों का दुःख दूर करने अथवा जगत का संहार करने वाले), अंशुमान (किरण धारण करने वाले), हिरण्यगर्भ (ब्रह्मा), शिशिर (स्वभाव से ही सुख देने वाले), तपन (गर्मी पैदा करने वाले), अहरकर (दिनकर), रवि (सबकी स्तुति के पात्र), अग्निगर्भ (अग्नि को गर्भ में धारण करने वाले), अदितिपुत्र, शंख (आनन्दस्वरूप एवं व्यापक), शिशिरनाशन (शीत का नाश करने वाले), व्योमनाथ (आकाश के स्वामी), तमोभेदी (अन्धकार को नष्ट करने वाले), ऋग, यजुः और सामवेद के पारगामी, घनवृष्टि (घनी वृष्टि के कारण), अपां मित्र (जल को उत्पन्न करने वाले), विन्ध्यीथीप्लवंगम (आकाश में तीव्रवेग से चलने वाले), आतपी (घाम उत्पन्न करने वाले), मण्डली (किरणसमूह को धारण करने वाले), मृत्यु (मौत के कारण), पिंगल (भूरे रंग वाले), सर्वतापन (सबको ताप देने वाले), कवि (त्रिकालदर्शी), विश्व (सर्वस्वरूप), महातेजस्वी, रक्त (लाल रंगवाले), सर्वभवोदभव (सबकी उत्पत्ति के कारण), नक्षत्र, ग्रह और तारों के स्वामी, विश्वभावन (जगत की रक्षा करने वाले), तेजस्वियों में भी अति तेजस्वी तथा द्वादशात्मा (बारह स्वरूपों में अभिव्यक्त) हैं। (इन सभी नामों से प्रसिद्ध सूर्यदेव !) आपको नमस्कार है।'
नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।
ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः।।16।।
'पूर्वगिरी उदयाचल तथा पश्चिमगिरि अस्ताचल के रूप में आपको नमस्कार है। ज्योतिर्गणों (ग्रहों और तारों) के स्वामी तथा दिन के अधिपति आपको प्रणाम है।'
जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।
नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः।।17।।
'आप जय स्वरूप तथा विजय और कल्याण के दाता है। आपके रथ में हरे रंग के घोड़े जुते रहते हैं। आपको बारंबार नमस्कार है। सहस्रों किरणों से सुशोभित भगवान सूर्य ! आपको बारंबार प्रणाम है। आप अदिति के पुत्र होने के कारण आदित्य नाम से प्रसिद्ध है, आपको नमस्कार है।'
नम उग्राय वीराय सारंगाय नमो नमः।
नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते।।18।।
'(परात्पर रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा हैं, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।'
ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूरायदित्यवर्चसे।
भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः।।19।।
'(परात्पर-रूप में) आप ब्रह्मा, शिव और विष्णु के भी स्वामी हैं। सूर आपकी संज्ञा है, यह सूर्यमण्डल आपका ही तेज है, आप प्रकाश से परिपूर्ण हैं, सबको स्वाहा कर देने वाला अग्नि आपका ही स्वरूप है, आप रौद्ररूप धारण करने वाले हैं, आपको नमस्कार है।'
तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।
कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः।।20।।
'आप अज्ञान और अन्धकार के नाशक, जड़ता एवं शीत के निवारक तथा शत्रु का नाश करने वाले हैं, आपका स्वरूप अप्रमेय है। आप कृतघ्नों का नाश करने वाले, सम्पूर्ण ज्योतियों के स्वामी और देवस्वरूप हैं, आपको नमस्कार है।'
तप्तचामीकराभाय हस्ये विश्वकर्मणे।
नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे।।21।।
'आपकी प्रभा तपाये हुए सुवर्ण के समान है, आप हरि (अज्ञान का हरण करने वाले) और विश्वकर्मा (संसार की सृष्टि करने वाले) हैं, तम के नाशक, प्रकाशस्वरूप और जगत के साक्षी हैं, आपको नमस्कार है।'
नाशयत्येष वै भूतं तमेव सृजति प्रभुः।
पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः।।22।।
'रघुनन्दन ! ये भगवान सूर्य ही सम्पूर्ण भूतों का संहार, सृष्टि और पालन करते हैं। ये ही अपनी किरणों से गर्मी पहुँचाते और वर्षा करते हैं।'
एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।
एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्।।23।।
'ये सब भूतों में अन्तर्यामीरूप से स्थित होकर उनके सो जाने पर भी जागते रहते हैं। ये ही अग्निहोत्र तथा अग्निहोत्री पुरुषों को मिलने वाले फल हैं।'
देवाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।
यानि कृत्यानि लोकेषु सर्वेषु परमप्रभुः।।24।।
'(यज्ञ में भाग ग्रहण करने वाले) देवता, यज्ञ और यज्ञों के फल भी ये ही हैं। सम्पूर्ण लोकों में जितनी क्रियाएँ होती हैं, उन सबका फल देने में ये ही पूर्ण समर्थ हैं।'
एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।
कीर्तयन् पुरुषः कश्चिन्नावसीदति राघव।।25।।
'राघव ! विपत्ति में, कष्ट में, दुर्गम मार्ग में तथा और किसी भय के अवसर पर जो कोई पुरुष इन सूर्यदेव का कीर्तन करता है, उसे दुःख नहीं भोगना पड़ता।'
पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।
एतत् त्रिगुणितं जप्तवा युद्धेषु विजयिष्ति।।26।।
'इसलिए तुम एकाग्रचित होकर इन देवाधिदेव जगदीश्वर की पूजा करो। इस आदित्य हृदय का तीन बार जप करने से तुम युद्ध में विजय पाओगे।'
अस्मिन् क्षणे महाबाहो रावणं त्वं जहिष्यसि।
एवमुक्त्वा ततोऽगस्त्यो जगाम स यथागतम्।।27।।
'महाबाहो ! तुम इसी क्षण रावण का वध कर सकोगे।' यह कहकर अगस्त्य जी जैसे आये थे, उसी प्रकार चले गये।
एतच्छ्रुत्वा महातेजा, नष्टशोकोऽभवत् तदा।
धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्।।28।।
आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वेदं परं हर्षमवाप्तवान्।
त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्।।29।।
रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा जयार्थे समुपागमत्।
सर्वयत्नेन महता वृतस्तस्य वधेऽभवत्।।30।।
उनका उपदेश सुनकर महातेजस्वी श्रीरामचन्द्रजी का शोक दूर हो गया। उन्होंने प्रसन्न होकर शुद्धचित्त से आदित्यहृदय को धारण किया और तीन बार आचमन करके शुद्ध हो भगवान सूर्य की ओर देखते हुए इसका तीन बार जप किया। इससे उन्हें बड़ा हर्ष हुआ। फिर परम पराक्रमी रघुनाथजी ने धनुष उठाकर रावण की ओर देखा और उत्साहपूर्वक विजय पाने के लिए वे आगे बढ़े। उन्होंने पूरा प्रयत्न करके रावण के वध का निश्चय किया।
अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितनाः परमं प्रहृष्यमाणः।
निशिचरपतिसंक्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति।।31।।
उस समय देवताओं के मध्य में खड़े हुए भगवान सूर्य ने प्रसन्न होकर श्रीरामचन्द्रजी की ओर देखा और निशाचराज रावण के विनाश का समय निकट जानकर हर्षपूर्वक कहा 'रघुनन्दन ! अब जल्दी करो।
Wednesday, January 4, 2023
फैसला
Tuesday, December 20, 2022
क्या लिखूं?
चतरई
क्या लिखूं ?
लिखूं मैं सेज़ सपनों की, या उनका इंतज़ार लिखूं ।।
लिखूं मैं ख़ुशी के वो चंद दिन, या उदासी भरी रातों को ।
लिखूं मैं चार दिन की चांदनी, या ज़िन्दगी की बातों को।।
लिखूं घर, द्वार, आंगन और उसमें खेलते सपने,
या घर के बाहर लगी, जंगल जैसी आग को लिखूं।।
वो घर के पास के मंदिर में जो चुपचाप हैं बैठे,
उन मर्यादा पुरुषोत्तम राम को लिखूं।
या श्री राम को लेकर मचे कोहराम को लिखूं।।
मैं झूठ को लिखूं, या सच्चाई को लिखूं,
कैसे हर दिल के बीच बढ़ रही,उस खाई को लिखूं।
मुनासि़ब नही लगता मुझे, खुद को खुद्दार लिख पाना,
और ईमान से कैसे मुझे , मक्कार मैं लिखूं।।
गुलाबी गाल, काले बाल, मजबूत कद काठी को,
गुमराह होकर हाथ में लिये वो लाठी को।
बिना सोचे, बिना समझे क्यों नौज़वान मैं लिखूं।।
सरेआम, झूठ पर झूठ सहकर, चुपचाप सोने वालो को,
किस हैसियत से अब इंसान मैं लिखूं।।
मुझे देखकर हंसना, हंसकर शुभकामना देना,
और आज़मा करके भी, मुझको काम न देना।
उजाडऩे को ख़ुद ही जो बेताब सा दिखे,
उस चमन रखवाले को कैसे बागवान मैं लिखूं।
मैं आशावाद को कब तक सजा, गुलदान मैं लिखूं।।
मेरे हिस्से में आए, कैसे उतने बेईमान मैं लिखूं,
या सुरक्षित हो जाने के लिए,
अब सिर्फ मेरा भारत महान मैं लिखूं।।
Tuesday, November 29, 2022
मज़बूरी का नाम...
मजबूरी का नाम महात्मा गांधी क्यों ?
हमारे देश में खासकर हिन्दी भाषी क्षेत्रों के पढ़े लिखे और सभ्य कहे जाने वाले हाईप्रोफाइल लोगों से लेकर, देहातों तक, किशोर विद्यार्थियों व शिक्षकों के मुंह से भी एक जुमला सुना जा सकता है। बड़ा ही प्रचलित भारतीय मुहाबरा बन गया है, यह। मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी। आम तौर पर जब कोई व्यक्ति किसी के प्रभाव के आगे, बल या दबाव के चलते बेबस हो जाता है। जब प्रतिकार करने की कोई गुंज़ाइश न रहे तो समझौता करते हुए एक आम हिन्दुस्तानी कह देता है कि 'मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी।' बड़ा अधिकारी अपने अधीनस्थ कर्मचारी को फटकार लगाता है, तो कर्मचारी क्या कर सकता है? मज़बूरी का नाम.......। ट्रेन लेट है तो सवारी क्या कर सकती है? बिजली चली गई, बाबू रिश्वत मांगता है, नेताजी सुनते नहीं, शहर में गंदगी है, स्कूल वाले मनमानी फीस बसूलते हैं, अस्पताल में डाक्टर ही नहीं है, बेटे ने घर से बेघर कर दिया। ऐसी हजारों हिन्दुस्तानी समस्याओं के आगे वेवश लोगों के लिए सबसे आसान निदान ह 'मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी'। सचमुच ही यदि आप मज़बूर हैं, तो भला क्या कर सकते हैं, जो मज़बूर नहीं है वो अपनी परेशानी से मुक्ति के ढेरों उपाय करेगा। पर जो मज़बूर है वो क्या करेगा। उसके लिए तो बस मज़बूरी का नाम.......।
पर गांधी उन मज़बूरों के लिए कतई नहीं हैं, जो गांधी के नाम का मिथ्या सहारा लेकर यथास्थिति में रहना चाहते हैं। संघर्ष से बचना चाहते हैं। बल्कि गांधी और उनके सिद्धांत उन मज़बूरों के लिए हैं, जो अपनेे ऊपर होने वाले अत्याचारों और शोषण से निज़ात पाने के लिए अन्य सारे उपाय कर चुके हों, इसके बाद भी वे अपनी बेहतरी के लिए अंतिम प्रयोग करने के लिए तैयार हों। ऐसे मज़बूर लोगों के लिए ब्रह्मास्त्र और सर्वाधिक सिद्ध मंत्र है, 'मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी।Ó यह सत्य है कि मज़बूरों के लिए सिर्फ एक ही नाम है 'महात्मा गांधी'। लेकिन उस संदर्भ में नहीं, जिसके लिए यह मुहाबरा आम हिन्दुस्तानियों में प्रचलित है।आज की दुनियां के लिए तो गांधी ही अंतिम रास्ता है, समस्या का अंतिम समाधान है 'महात्मा गांधीÓ, जिसके प्रयोग पर असफलता की भी कोई गुंज़ाइश ही नहीं है। नफरत का पूरी तरह से अंत करने वाला दर्शन है महात्मा गांधी। जहां सारे अस्त्र-शस्त्र विफल हो जाते हैं, वहां ब्रह्मास्त्र हैं, रोशनी की अंतिम उम्मीद है महात्मा गांधी। अहिंसा के सिद्धांत के आगे बड़े-बड़े योद्धा नतमस्तक हुए हैं, और होते रहेंगे। तभी तो सारी दुनियां के लिए एक आदर्श है महात्मा गांधी।
अलवर्ट आंइस्टीन जैसे महान वैज्ञानिक ने यूं ही नहीं कह दिया था कि आने वाले लोग यकीन नहीं करेंगे कि गांधी जैसा हाड़-मांस का पुतला सचमुच ही इस ज़मीन पर पैदा हुआ था। विश्व की श्रेष्ठतम् संस्थाओं नें जिसे बीती शताब्दी का महान नेता माना, वो भी सारी दुनियां के संदर्भ में। दुनिया के सबसे शक्तिशाली राष्ट्र का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति यूं ही नहीं कह देता कि 'मैं आज जो कुछ हूं महात्मा गांधी की बज़ह से हूं। और आज के अमेरिका की जड़ें महात्मा गांधी के भारत और भारतीय स्वतंत्रता के अहिंसा आंदोलन में हैं, जिसका नेतृत्व महात्मा गांधी ने किया।' अहिंसा की नीति के ज़रिए विश्व भर में शांति के संदेश को बढ़ावा देने में महात्मा गांधी के योगदान को सराहने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2007 से महात्मा गांधी के जन्म दिन 2 अक्टूबर को विश्व अहिंसा दिवस मनाने का प्रस्ताव पारित किया, इस सिलसिले में भारत द्वारा रखे प्रस्ताव को संयुक्त राष्ट्र महासभा के कुल 191 सदस्य देशों में से 140 से भी अधिक देशों ने सह-प्रायोजित किया था। इनमें अ$फगानिस्तान, नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, भूटान जैसे भारत के पड़ोसी देशों के अलावा अ$फरीका और अमरीका महाद्वीप के कई देश शामिल थे। मौज़ूदा व्यवस्था में अहिंसा की सार्थकता को मानते हुए बिना मतदान के ही यह प्रस्ताव पास हुआ था। और अब सारी दुनिया गांधी के जन्म दिन को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाती है। जऱा सोचिये कि सारी दुनिया ने गांधी को किस रूप में अपनाया और हम कहते हैं मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी।
इससे ज्य़ादा दुर्भाग्य और क्या होगा? यह मुहाबरा जिस संदर्भ में प्रचलित हुआ, उससे तो यही सिद्ध होता है, कि अब तक गांधीजी को आमजन तक सही रूप में नहीं पहुंचा सके। किस-किसको पता है कि, मोहनदास करमचंद गांधी ने कब और क्यों कहा कि कोई एक गाल पर चांटा मारे तो उसके आगे अपना दूसरा गाल कर दो, फिर भी छोटे-छोटे बच्चों को तक को इसे मुहाबरे के रूप में प्रयोग करते देखा जा सकता है। ये कौन सिखाता है, कहां से चल जाता है? जबकि सारी दुनिया यह मानती है कि गांधी अंतिम समाधान हैं। किसी पाठ्यपुस्तक में नहीं लिखा कि गांधी ने समस्याऐं पैदा की। कम से कम भारत में तो अब तक किसी अध्यापक को यह पाठ््यक्रम नहीं सोंपा गया होगा, जिसकी सहायता से विद्यार्थिओं को यह सिखाया जा सके कि देश की अधिकांश समस्याओं की जड़ महात्मा गांधी हैं। फिर मेरे देश का नौज़वान जो कालेज से ग्रेजुएट होकर निकलता है, और अच्छे सूट-बूट पहनना सीख जाता है, वह किस जानकारी और शोध के आधार पर सारी दुनिया के आदर्श महात्मा गांधी को गाली देने लगता है? गांधी गलत थे। यह कौन अध्यापक सिखा देते हैं? आग्रह इतना ही है कि हमारे राष्ट्रपिता के बारे में कोई भी टिप्पणी तभी करें, जबकि संदर्भित बिषय पर आपकी पक्की जानकारी हो और ऐसा ही आग्रह अन्य लोगों से करें।
साथ ही बहुत अधिक दु:ख होता है, जब देश का नौज़वान और वह भी शिक्षित नौज़वान जिसके ऊपर दूसरों को सिखाने की जि़म्मेदारी हो, खुद शोषण और ग़ैरबराबरी सहता रहता है, और संघर्ष से बचने के लिए कह देता है, मज़बूरी का नाम महात्मा गांधी। अब तो आसानी से यह समझा जा सकता है कि सारी दुनियां में भारत के सम्मान के प्रमुख कारकों (अनेकता में एकता, विश्व का सबसे बड़ा सफल लोकतंत्र, धर्म निरपेक्ष राज्य व्यवस्था) में एक प्रमुख कारक है-मोहनदास करमचंद गांधी और उनका जीवन दर्शन।
दीपक तिवारी
अध्यापक
मो. 9425150255
Thursday, November 24, 2022
गालियां मुझे अतिप्रिय हैं💐💐💐
Sunday, November 13, 2022
अटलजी की श्रद्धांजली, पंडित नेहरू को...
अटलजी के नेहरू
भारत के पहले औऱ लगातार 17 वर्षो तक प्रधानमंत्री रहे पंडित #जवाहरलाल जी, देश की आज़ादी के आंदोलन में कुल 10 किस्तों में 3259 दिन यानि पौने नौ वर्षों से अधिक समय जेल में रहे।
10 बड़ी किताबे भी लिखी, जिनमे भारत एक खोज #discoveryofindia,#glimpsesofworldhistory, #beforefreedom इत्यादि शामिल हैं।
ये भी ग़ज़ब की बात है कि इस देश में नेहरूजी के बारे में जानकारी कम और भ्रांतियां अधिक है।
नेहरूजी का आजीवन धुर विरोध करने वाले और भारतीय राजनीति के अद्वितीय महान नेता पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी के शब्दों में नेहरूजी को विनम्र श्रद्धांजली।
अध्यक्ष महोदय,
एक सपना था जो अधूरा रह गया, एक गीत था जो गूँगा हो गया, एक लौ थी जो अनन्त में विलीन हो गई। सपना था एक ऐसे संसार का जो भय और भूख से रहित होगा, गीत था एक ऐसे महाकाव्य का जिसमें गीता की गूँज और गुलाब की गंध थी। लौ थी एक ऐसे दीपक की जो रात भर जलता रहा, हर अँधेरे से लड़ता रहा और हमें रास्ता दिखाकर, एक प्रभात में निर्वाण को प्राप्त हो गया।
मृत्यु ध्रुव है, शरीर नश्वर है। कल कंचन की जिस काया को हम चंदन की चिता पर चढ़ा कर आए, उसका नाश निश्चित था। लेकिन क्या यह ज़रूरी था कि मौत इतनी चोरी छिपे आती? जब संगी-साथी सोए पड़े थे, जब पहरेदार बेखबर थे, हमारे जीवन की एक अमूल्य निधि लुट गई। भारत माता आज शोकमग्ना है – उसका सबसे लाड़ला राजकुमार खो गया। मानवता आज खिन्नमना है – उसका पुजारी सो गया। शांति आज अशांत है – उसका रक्षक चला गया। दलितों का सहारा छूट गया। जन जन की आँख का तारा टूट गया। यवनिका पात हो गया। विश्व के रंगमंच का प्रमुख अभिनेता अपना अंतिम अभिनय दिखाकर अन्तर्ध्यान हो गया।
महर्षि वाल्मीकि ने रामायण में भगवान राम के सम्बंध में कहा है कि वे असंभवों के समन्वय थे। पंडितजी के जीवन में महाकवि के उसी कथन की एक झलक दिखाई देती है। वह शांति के पुजारी, किन्तु क्रान्ति के अग्रदूत थे; वे अहिंसा के उपासक थे, किन्तु स्वाधीनता और सम्मान की रक्षा के लिए हर हथियार से लड़ने के हिमायती थे।
वे व्यक्तिगत स्वाधीनता के समर्थक थे किन्तु आर्थिक समानता लाने के लिए प्रतिबद्ध थे। उन्होंने समझौता करने में किसी से भय नहीं खाया, किन्तु किसी से भयभीत होकर समझौता नहीं किया। पाकिस्तान और चीन के प्रति उनकी नीति इसी अद्भुत सम्मिश्रण की प्रतीक थी। उसमें उदारता भी थी, दृढ़ता भी थी। यह दुर्भाग्य है कि इस उदारता को दुर्बलता समझा गया, जबकि कुछ लोगों ने उनकी दृढ़ता को हठवादिता समझा।
मुझे याद है, चीनी आक्रमण के दिनों में जब हमारे पश्चिमी मित्र इस बात का प्रयत्न कर रहे थे कि हम कश्मीर के प्रश्न पर पाकिस्तान से कोई समझौता कर लें तब एक दिन मैंने उन्हें बड़ा क्रुद्ध पाया। जब उनसे कहा गया कि कश्मीर के प्रश्न पर समझौता नहीं होगा तो हमें दो मोर्चों पर लड़ना पड़ेगा तो बिगड़ गए और कहने लगे कि अगर आवश्यकता पड़ेगी तो हम दोनों मोर्चों पर लड़ेंगे। किसी दबाव में आकर वे बातचीत करने के खिलाफ थे।
महोदय, जिस स्वतंत्रता के वे सेनानी और संरक्षक थे, आज वह स्वतंत्रता संकटापन्न है। सम्पूर्ण शक्ति के साथ हमें उसकी रक्षा करनी होगी। जिस राष्ट्रीय एकता और अखंडता के वे उन्नायक थे, आज वह भी विपदग्रस्त है। हर मूल्य चुका कर हमें उसे कायम रखना होगा। जिस भारतीय लोकतंत्र की उन्होंने स्थापना की, उसे सफल बनाया, आज उसके भविष्य के प्रति भी आशंकाएं प्रकट की जा रही हैं। हमें अपनी एकता से, अनुशासन से, आत्म-विश्वास से इस लोकतंत्र को सफल करके दिखाना है। नेता चला गया, अनुयायी रह गए। सूर्य अस्त हो गया, तारों की छाया में हमें अपना मार्ग ढूँढना है।
यह एक महान परीक्षा का काल है। यदि हम सब अपने को समर्पित कर सकें एक ऐसे महान उद्देश्य के लिए जिसके अन्तर्गत भारत सशक्त हो, समर्थ और समृद्ध हो और स्वाभिमान के साथ विश्व शांति की चिरस्थापना में अपना योग दे सके तो हम उनके प्रति सच्ची श्रद्धांजलि अर्पित करने में सफल होंगे। संसद में उनका अभाव कभी नहीं भरेगा। शायद तीन मूर्ति को उन जैसा व्यक्ति कभी भी अपने अस्तित्व से सार्थक नहीं करेगा।
वह व्यक्तित्व, वह ज़िंदादिली, विरोधी को भी साथ ले कर चलने की वह भावना, वह सज्जनता, वह महानता शायद निकट भविष्य में देखने को नहीं मिलेगी। मतभेद होते हुए भी उनके महान आदर्शों के प्रति, उनकी प्रामाणिकता के प्रति, उनकी देशभक्ति के प्रति, और उनके अटूट साहस के प्रति हमारे हृदय में आदर के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।
इन्हीं शब्दों के साथ मैं उस महान आत्मा के प्रति अपनी विनम्र श्रद्धांजलि अर्पित करता हूँ।
शत शत नमन
दीपक देहाती, पमारिया से...
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Sunday, November 6, 2022
घाघ...
Friday, November 4, 2022
अर्थ ही धन है?
Thursday, November 3, 2022
वृंदा से तुलसी बनने की पौराणिक कथा-
एक बार शिव ने अपने तेज को समुद्र में फैंक दिया था। उससे एक महातेजस्वी बालक ने जन्म लिया। यह बालक आगे चलकर जालंधर के नाम से पराक्रमी दैत्य राजा बना। इसकी राजधानी का नाम जालंधर नगरी था।
दैत्यराज कालनेमी की कन्या वृंदा का विवाह जालंधर से हुआ। जालंधर महाराक्षस था। अपनी सत्ता के मद में चूर उसने माता लक्ष्मी को पाने की कामना से युद्ध किया, परंतु समुद्र से ही उत्पन्न होने के कारण माता लक्ष्मी ने उसे अपने भाई के रूप में स्वीकार किया। वहां से पराजित होकर वह देवी पार्वती को पाने की लालसा से कैलाश पर्वत पर गया।
भगवान देवाधिदेव शिव का ही रूप धर कर माता पार्वती के समीप गया, परंतु मां ने अपने योगबल से उसे तुरंत पहचान लिया तथा वहां से अंतर्ध्यान हो गईं।
देवी पार्वती ने क्रुद्ध होकर सारा वृतांत भगवान विष्णु को सुनाया। जालंधर की पत्नी वृंदा अत्यन्त पतिव्रता स्त्री थी। उसी के पतिव्रत धर्म की शक्ति से जालंधर न तो मारा जाता था और न ही पराजित होता था। इसीलिए जालंधर का नाश करने के लिए वृंदा के पतिव्रत धर्म को भंग करना बहुत ज़रूरी था।
इसी कारण भगवान विष्णु ऋषि का वेश धारण कर वन में जा पहुंचे, जहां वृंदा अकेली भ्रमण कर रही थीं। भगवान के साथ दो मायावी राक्षस भी थे, जिन्हें देखकर वृंदा भयभीत हो गईं। ऋषि ने वृंदा के सामने पल में दोनों को भस्म कर दिया। उनकी शक्ति देखकर वृंदा ने कैलाश पर्वत पर महादेव के साथ युद्ध कर रहे अपने पति जालंधर के बारे में पूछा।
ऋषि ने अपने माया जाल से दो वानर प्रकट किए। एक वानर के हाथ में जालंधर का सिर था तथा दूसरे के हाथ में धड़। अपने पति की यह दशा देखकर वृंदा मूर्छित हो कर गिर पड़ीं। होश में आने पर उन्होंने ऋषि रूपी भगवान से विनती की कि वह उसके पति को जीवित करें।
भगवान ने अपनी माया से पुन: जालंधर का सिर धड़ से जोड़ दिया, परंतु स्वयं भी वह उसी शरीर में प्रवेश कर गए। वृंदा को इस छल का ज़रा आभास न हुआ। जालंधर बने भगवान के साथ वृंदा पतिव्रता का व्यवहार करने लगी, जिससे उसका सतीत्व भंग हो गया। ऐसा होते ही वृंदा का पति जालंधर युद्ध में हार गया।
इस सारी लीला का जब वृंदा को पता चला, तो उसने क्रुद्ध होकर भगवान विष्णु को शिला होने का श्राप दे दिया तथा स्वयं सती हो गईं। जहां वृंदा भस्म हुईं, वहां तुलसी का पौधा उगा। भगवान विष्णु ने वृंदा से कहा, ‘हे वृंदा। तुम अपने सतीत्व के कारण मुझे लक्ष्मी से भी अधिक प्रिय हो गई हो। अब तुम तुलसी के रूप में सदा मेरे साथ रहोगी। जो मनुष्य भी मेरे शालिग्राम रूप के साथ तुलसी का विवाह करेगा उसे इस लोक और परलोक में विपुल यश प्राप्त होगा।’
जिस घर में तुलसी होती हैं, वहां यम के दूत भी असमय नहीं जा सकते। गंगा व नर्मदा के जल में स्नान तथा तुलसी का पूजन बराबर माना जाता है। चाहे मनुष्य कितना भी पापी क्यों न हो, मृत्यु के समय जिसके प्राण मंजरी रहित तुलसी और गंगा जल मुख में रखकर निकल जाते हैं, वह पापों से मुक्त होकर वैकुंठ धाम को प्राप्त होता है। जो मनुष्य तुलसी व आंवलों की छाया में अपने पितरों का श्राद्ध करता है, उसके पितर मोक्ष को प्राप्त हो जाते हैं।
उसी दैत्य जालंधर की यह भूमि जलंधर नाम से विख्यात है। सती वृंदा का मंदिर मोहल्ला कोट किशनचंद में स्थित है। कहते हैं इस स्थान पर एक प्राचीन गुफ़ा थी, जो सीधी हरिद्वार तक जाती थी। सच्चे मन से 40 दिन तक सती वृंदा देवी के मंदिर में पूजा करने से सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं।
आज ही देव प्रबोधनी, तुलसी विवाह एकादशी है।
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विकल्प दिया गया है।आप यह भी पढ़ सकते है - बेचारे धृतराष्ट्र
Wednesday, November 2, 2022
कबाड़ा
कि खरीदा जा रहा है,
अब भी कबाड़ा।
यदि खरीदने वाले भी,
इसे कबाड़ा मान लेते,
तो आपका घर भर गया होता,
इसी कबाड़े से।
अब उन सब का घर चल रहा है,
आपके कबाड़े से।
अब तो कबाड़े से कितने अचरज हो रहे हैं
कहीं बिजली, कहीं खाद, कई ईंधन हो रहे हैं।
और भी बहुत कुछ, मतलब बहुत ही ज़्यादा कुछ होने लगा कबाड़े से।
पता करना।
मुझे तो ये समझ नहीं आ रहा,
कि क्या करें।
अब कबाड़ा बेंच दें,
या कबाड़ा कर लें। -चालाक
आदतें...
Tuesday, November 1, 2022
बेचारे संजय...
बेचारे संजय...
अपना कलेजा।
बेचारे धृतराष्ट्र...😎😎😎
धृतराष्ट्र अंधे न होते तो?
तमाशा
चलो चौराहे पर तमाशा कर लेते हैं।
ये बस्ती बड़ी भोली है,
यहां के लोग बिन जाने-समझे ही,
आशा कर लेते हैं।
गरीबों को सोना मुनासिब नहीं कहकर,
हम यहां सोने को कांसा कर लेते हैं।
चलो चौराहे पर तमाशा कर लेते हैं।
जब लुटे लोग निराशा कर लेते हैं।
पाना हमें भी दफीना ही है,
इसलिए अब खोदने का नाम, तराशा़ कर लेते हैं।
खेल मां यशोदा का कर लेते हैं।
चलो चौराहे पर तमाशा कर लेते हैं।
अब तक लोग, ठगे जाने पर क्या कर लेते हैं।।
मौका मिला है, चलो कुछ ऐसा कर लेतेे हैं।
लाठी उठाए बिना ही, आज़ नाग दमन कर लेते हैं।
एक बार फिर कर लेते हैं...............
चलो चौराहे पर तमाशा कर लेते हैं?
-चालाक
Monday, October 31, 2022
श्री गणेशाय नमः
अर्थात:- हे! देवता महा गणपति को मेरा प्रणाम |
ॐ नमस्ते गणपतये ।
त्वमेव प्रत्यक्षन् तत्त्वमसि ।
त्वमेव केवलङ् कर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलन् धर्ताऽसि ।
त्वमेव केवलम् हर्ताऽसि ।
त्वमेव सर्वङ् खल्विदम् ब्रह्मासि ।
त्वं साक्षादात्माऽसि नित्यम् ।।
श्लोक 2.
ऋतं वच्मि । सत्यं वच्मि ।।
अर्थात :- ज्ञान कहता हूँ सच्चाई कहता हूँ |
श्लोक 3
अव त्वम् माम् । अव वक्तारम् ।
अव श्रोतारम् । अव दातारम् ।
अव धातारम् । अवानूचानमव शिष्यम् ।
अव पश्चात्तात् । अव पुरस्तात् ।
अवोत्तरात्तात् । अव दक्षिणात्तात् ।
अव चोध्र्वात्तात् । अवाधरात्तात् ।
सर्वतो माम् पाहि पाहि समन्तात् ।।
अर्थात :- तुम मेरे हो मेरी रक्षा करों, मेरी वाणी की रक्षा करो| मुझे सुनने वालो की रक्षा करों | मुझे देने वाले की रक्षा करों मुझे धारण करने वाले की रक्षा करों | वेदों उपनिषदों एवम उसके वाचक की रक्षा करों साथ उससे ज्ञान लेने वाले शिष्यों की रक्षा करों | चारो दिशाओं पूर्व, पश्चिम, उत्तर, एवम दक्षिण से सम्पूर्ण रक्षा करों |
श्लोक 4
त्वं वाङ्मयस्त्वञ् चिन्मयः ।
त्वम् आनन्दमयस्त्वम् ब्रह्ममयः ।
त्वं सच्चिदानन्दाद्वितीयोऽसि ।
त्वम् प्रत्यक्षम् ब्रह्मासि ।
त्वम् ज्ञानमयो विज्ञानमयोऽसि ।।
अर्थात:- तुम वाम हो, तुम ही चिन्मय हो, तुम ही आनन्द ब्रह्म ज्ञानी हो, तुम ही सच्चिदानंद, अद्वितीय रूप हो , प्रत्यक्ष कर्ता हो तुम ही ब्रह्म हो, तुम ही ज्ञान विज्ञान के दाता हो |
श्लोक 5
सर्वञ् जगदिदन् त्वत्तो जायते ।
सर्वञ् जगदिदन् त्वत्तस्तिष्ठति ।
सर्वञ् जगदिदन् त्वयि लयमेष्यति ।
सर्वञ् जगदिदन् त्वयि प्रत्येति ।
त्वम् भूमिरापोऽनलोऽनिलो नभः ।
त्वञ् चत्वारि वाव्पदानि ||
अर्थात :- इस जगत के जन्म दाता तुम ही हो,तुमने ही सम्पूर्ण विश्व को सुरक्षा प्रदान की हैं सम्पूर्ण संसार तुम में ही निहित हैं पूरा विश्व तुम में ही दिखाई देता हैं तुम ही जल, भूमि, आकाश और वायु हो |तुम चारों दिशा में व्याप्त हो |
श्लोक 6
त्वङ् गुणत्रयातीतः ।
(त्वम् अवस्थात्रयातीतः ।)
त्वन् देहत्रयातीतः । त्वङ् कालत्रयातीतः ।
त्वम् मूलाधारस्थितोऽसि नित्यम् ।
त्वं शक्तित्रयात्मकः ।
त्वां योगिनो ध्यायन्ति नित्यम् ।
त्वम् ब्रह्मा त्वं विष्णुस्त्वम् रुद्रस्त्वम्
इन्द्रस्त्वम् अग्निस्त्वं वायुस्त्वं सूर्यस्त्वञ चन्द्रमास्त्वम्
ब्रह्मभूर्भुवः स्वरोम्
अर्थात :- तुम सत्व,रज,तम तीनो गुणों से भिन्न हो | तुम तीनो कालो भूत, भविष्य और वर्तमान से भिन्न हो | तुम तीनो देहो से भिन्न हो |तुम जीवन के मूल आधार में विराजमान हो | तुम में ही तीनो शक्तियां धर्म, उत्साह, मानसिक व्याप्त हैं |योगि एवम महा गुरु तुम्हारा ही ध्यान करते हैं | तुम ही ब्रह्म,विष्णु,रूद्र,इंद्र,अग्नि,वायु,सूर्य,चन्द्र हो | तुम मे ही गुणों सगुण, निर्गुण का समावेश हैं |
श्लोक 7 .
गणादिम् पूर्वमुच्चार्य
वर्णादिन् तदनन्तरम् ।
अनुस्वारः परतरः । अर्धेन्दुलसितम् ।
तारेण ऋद्धम् । एतत्तव मनुस्वरूपम् ।
गकारः पूर्वरूपम् । अकारो मध्यमरूपम् ।
अनुस्वारश्चान्त्यरूपम् ।
बिन्दुरुत्तररूपम् ।
नादः सन्धानम् । संहिता सन्धिः ।
सैषा गणेशविद्या । गणक ऋषिः ।
निचृद्गायत्री छन्दः । गणपतिर्देवता ।
ॐ गँ गणपतये नमः ।।
अर्थात :- “गण” का उच्चारण करके बाद के आदिवर्ण अकार का उच्चारण करें | ॐ कार का उच्चारण करे | यह पुरे मन्त्र ॐ गं गणपतये नम: का भक्ति से उच्चारण करें |
श्लोक 8
एकदन्ताय विद्महे । वक्रतुण्डाय धीमहि ।
तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्
अर्थात :- एकदंत, वक्रतुंड का हम ध्यान करते हैं | हमें इस सद मार्ग पर चलने की भगवन प्रेरणा दे
श्लोक 9
एकदन्तञ् चतुर्हस्तम्,
पाशमङ्कुशधारिणम् ।
रदञ् च वरदम् हस्तैर्बिभ्राणम्,
मूषकध्वजम् ।
रक्तं लम्बोदरं,
शूर्पकर्णकम् रक्तवाससम् ।
रक्तगन्धानुलिप्ताङ्गम्,
रक्तपुष्पैःसुपूजितम् ।
भक्तानुकम्पिनन् देवञ्,
जगत्कारणमच्युतम् ।
आविर्भूतञ् च सृष्ट्यादौ,
प्रकृतेः पुरुषात्परम् ।
एवन् ध्यायति यो नित्यं
स योगी योगिनां वरः ||
अर्थात :- भगवान गणेश एकदन्त चार भुजाओं वाले हैं जिसमे वह पाश,अंकुश, दन्त, वर मुद्रा रखते हैं | उनके ध्वज पर मूषक हैं | यह लाल वस्त्र धारी हैं | चन्दन का लेप लगा हैं | लाल पुष्प धारण करते हैं | सभी की मनोकामना पूरी करने वाले जगत में सभी जगह व्याप्त हैं | श्रृष्टि के रचियता हैं | जो इनका ध्यान सच्चे ह्रदय से करे वो महा योगि हैं |
श्लोक 10
नमो व्रातपतये, नमो गणपतये,
नमः प्रमथपतये,
नमस्ते अस्तु लम्बोदराय एकदन्ताय,
विघ्ननाशिने शिवसुताय,
वरदमूर्तये नमः ||
अर्थात :– व्रातपति, गणपति को प्रणाम, प्रथम पति को प्रणाम, एकदंत को प्रणाम, विध्नविनाशक, लम्बोदर, शिवतनय श्री वरद मूर्ती को प्रणाम |
श्लोक 11
एतदथर्वशीर्षं योऽधीते ।
स ब्रह्मभूयाय कल्पते ।
स सर्वविघ्नैर्न बाध्यते ।
स सर्वतः सुखमेधते ।
स पञ्चमहापापात् प्रमुच्यते ।
सायमधीयानो दिवसकृतम्
पापन् नाशयति ।
प्रातरधीयानो रात्रिकृतम्
पापन् नाशयति ।
सायम् प्रातः प्रयुञ्जानोऽअपापो भवति ।
सर्वत्राधीयानोऽपविघ्नो भवति ।
धर्मार्थकाममोक्षञ् च विन्दति ।
इदम् अथर्वशीर्षम् अशिष्याय न देयम् ।
यो यदि मोहाद्दास्यति
स पापीयान् भवति ।
सहस्रावर्तनात् ।
यं यङ् काममधीते
तन् तमनेन साधयेत् ।।
अर्थात :- इस अथर्वशीष का पाठ करता हैं वह विघ्नों से दूर होता हैं | वह सदैव ही सुखी हो जाता हैं वह पंच महा पाप से दूर हो जाता हैं | सन्ध्या में पाठ करने से दिन के दोष दूर होते हैं | प्रातः पाठ करने से रात्रि के दोष दूर होते हैं |हमेशा पाठ करने वाला दोष रहित हो जाता हैं और साथ ही धर्म, अर्थ, काम एवम मोक्ष पर विजयी बनता हैं | इसका 1 हजार बार पाठ करने से उपासक सिद्धि प्राप्त कर योगि बनेगा |
श्लोक 12
अनेन गणपतिमभिषिञ्चति ।
स वाग्मी भवति ।
चतुथ्र्यामनश्नन् जपति
स विद्यावान् भवति ।
इत्यथर्वणवाक्यम् ।
ब्रह्माद्यावरणम् विद्यात् ।
न बिभेति कदाचनेति ।।
अर्थात :- जो इस मन्त्र के उच्चारण के साथ गणेश जी का अभिषेक करता हैं उसकी वाणी उसकी दास हो जाती हैं | जो चतुर्थी के दिन उपवास कर जप करता हैं विद्वान बनता हैं | जो ब्रह्मादि आवरण को जानता है वह भय मुक्त होता हैं |
श्लोक 13
यो दूर्वाङ्कुरैर्यजति ।
स वैश्रवणोपमो भवति ।
यो लाजैर्यजति, स यशोवान् भवति ।
स मेधावान् भवति ।
यो मोदकसहस्रेण यजति ।
स वाञ्छितफलमवाप्नोति ।
यः साज्यसमिद्भिर्यजति
स सर्वं लभते, स सर्वं लभते ।।
अर्थात :- जो दुर्वकुरो द्वारा पूजन करता हैं वह कुबेर के समान बनता हैं जो लाजा के द्वारा पूजन करता हैं वह यशस्वी बनता हैं मेधावी बनता हैं जो मोदको के साथ पूजन करता हैं वह मन: अनुसार फल प्राप्त करता हैं | जो घृतात्क समिधा के द्वारा हवन करता हैं वह सब कुछ प्राप्त करता हैं |
श्लोक 14
अष्टौ ब्राह्मणान् सम्यग्ग्राहयित्वा,
सूर्यवर्चस्वी भवति ।
सूर्यग्रहे महानद्याम् प्रतिमासन्निधौ
वा जप्त्वा, सिद्धमन्त्रो भवति ।
महाविघ्नात् प्रमुच्यते ।
महादोषात् प्रमुच्यते ।
महापापात् प्रमुच्यते ।
स सर्वविद् भवति, स सर्वविद् भवति ।
य एवम् वेद ।।
अर्थात :- जो आठ ब्राह्मणों को उपनिषद का ज्ञाता बनाता हैं वे सूर्य के सामान तेजस्वी होते हैं | सूर्य ग्रहण के समय नदी तट पर अथवा अपने इष्ट के समीप इस उपनिषद का पाठ करे तो सिद्धी प्राप्त होती हैं | जिससे जीवन की रूकावटे दूर होती हैं पाप कटते हैं वह विद्वान हो जाता हैं यह ऐसे ब्रह्म विद्या हैं |
शान्तिमन्त्र
ॐ भद्रङ् कर्णेभिः शृणुयाम देवाः ।
भद्रम् पश्येमाक्षभिर्यजत्राः ।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिः
व्यशेम देवहितं यदायुः ।।
अर्थात :-हे ! गणपति हमें ऐसे शब्द कानो में पड़े जो हमें ज्ञान दे और निन्दा एवम दुराचार से दूर रखे |हम सदैव समाज सेवा में लगे रहे था बुरे कर्मों से दूर रहकर हमेशा भगवान की भक्ति में लीन रहें |हमारे स्वास्थ्य पर हमेशा आपकी कृपा रहे और हम भोग विलास से दूर रहें | हमारे तन मन धन में ईश्वर का वास हो जो हमें सदैव सुकर्मो का भागी बनाये | यही प्रार्थना हैं |
ॐ स्वस्ति न इन्द्रो वृद्धश्रवाः ।
स्वस्ति नः पूषा विश्ववेदाः ।
स्वस्ति नस्ताक्ष्र्योऽअरिष्टनेमिः
स्वस्ति नो बृहस्पतिर्दधातु ।।
ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः ।।
अर्थात : चारो दिशा में जिसकी कीर्ति व्याप्त हैं वह इंद्र देवता जो कि देवों के देव हैं उनके जैसे जिनकी ख्याति हैं जो बुद्धि का अपार सागर हैं जिनमे बृहस्पति के सामान शक्तियाँ हैं जिनके मार्गदर्शन से कर्म को दिशा मिलती हैं जिससे समस्त मानव जाति का भला होता हैं |
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